फिशकॉपफेड बना सफेद हाथी, एमडी हुए निरंकुश


कार्यालय संवाददाता

नई दिल्ली। देश के मत्स्य सहकारियों की अग्रणी संस्था फिशकॉपफेड यानी राष्ट्रीय मत्स्य जीवी सहकारी संघ मर्यादित नई दिल्ली जो 1982 में वजूद में आई। जो कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के पशुपालन दुग्ध एवं मत्स्य विभाग के प्रशासनिक नियंत्रण/ अधीन काम कर रही है। इस संस्था से देश के लगभग 20 हजार प्राथमिक मत्स्य, सहकारी समितियां एवं जिला कमिश्नरी एवं राज्य की लगभग सोसाइटी / फेडरेशन एवं 30 लाख सदस्य जुड़े हुए हैं। यह संस्था प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना के तहत लगभग 45 लाख से ऊपर के बीमा का कार्य देख रही है। मत्स्य सहकारियों के वेलफेयर, प्रमोशनल / कमर्शियल एक्टिविटी एवं उत्थान के लिए सराहनीय भूमिका निभा रही है। दूसरे शब्दों में यह कहा जाए कि समय-समय पर गरीब मछुआरों एवं मत्स्य सहकारियों के संस्थाओं के लिए एक स्पोक्समैन का कार्य करती है।
देश के करोड़ों मछुआरों के लिए मार्गदर्शक है। हैरानी की बात तो यह है कि संस्था के प्रबंध निदेशक की वित्तीय अनियमितताएं/ करप्ट प्रैक्टिस की शिकायत फिशकॉपफेड के एक पूर्व कर्मचारी ने विजिलेंस कमिश्नर से की। इस शिकायत की सीवीसी ने तुरंत जांच के आदेश दे दिए। इस मामले की जांच कृषि मंत्रालय के सीनियर ऑफिसर के द्वारा की गई और पूरे तरीके से अनियमितताएं पाई गई। कृषि मंत्रालय के विजिलेंस विभाग द्वारा एक पत्र जो दिनांक 20 अक्टूबर 2015 को जारी किया गया, जिसमें 3 महीने के अंदर प्रबंध निदेशक के ऊपर एक्शन लेकर मंत्रालय को सूचित करने के लिए कहा गया। लेकिन फिशकॉपफेड के बोर्ड एवं प्रबंध निदेशक की मिलीभगत के चलते गलत रिपोर्ट / सूचना मंत्रालय को पेश की गई।
गौरतलब है कि इस दौरान प्रबन्ध निदेशक अपने पद पर आसीन रहे। जबकि नियमानुसार प्रबन्ध निदेशक अपने पद पर किसी भी जांच के दौरान तैनात नही रह सकते। तकरीबन पौने तीन साल गुजर जाने के दौरान शिकायतकर्ता ने बार बार मंत्रालय को अनुस्मारक पत्र भेजकर एक्शन लेने के लिए अनुरोध किये। परंतु मंत्रालय के अधिकारियों की कुम्भकर्णी नींद के चलते तथा फिशकॉपफेड के बोर्ड की गलत एवं भ्रामक सूचना मंत्रालय में प्रबन्ध निदेशक द्वारा भेजकर अपना बचाव किया जाता रहा। मंत्रालय के आदेशों को धता बताकर आज तक प्रबन्ध निदेशक बोर्ड की आड़ लेकर अपनी सीट पर विराजमान है और कृषि मंत्रालय मूकदर्शक बना हुआ है। कृषि मंत्रालय को जो रिपोर्ट फिशकॉपफेड बोर्ड की बताई गई है उसमें यह भी उल्लेख नही है कि बोर्ड की इस बाबत कब बैठक आयोजित की गई। बोर्ड ने किन किन सदस्यों को प्रबंध निदेशक के विरुद्ध जांच करने के लिए चयनित किया। जांच समिति के सदस्यों के नामो का भी कोई उल्लेख नही है। सवाल यह है कि क्या जांच समिति ने जांच के लिए प्रबंध निदेशक को उनके पद से हटाने के लिए क्या किसी प्रकार की कोई सिफारिश की थी अगर की थी तो सबपर अमल क्यों नही किया गया। अगर जांच समिति ने प्रबंध निदेशक को उनके पद से नही हटाकर नियम विरोधी जांच कैसे कर ली और फिर इस जांच का क्या औचित्य है। इसका परिणाम यह है कि प्रबन्ध निदेशक ने अपने स्वार्थ के चलते इस संस्था को बर्बादी के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है और ऑडिट रिपोर्ट में 5 सालों से घाटा हो रहा है। जिससे मंत्रालय द्वारा कोई भी स्कीम नहीं चल पा रही है और देश के करोड़ों मछुआरों को नुकसान हो रहा है। बोर्ड एवं भी एमडी दोनों अपना हित साध रहे हैं। हैंड इन ग्लोव्स की भूमिका निभा रहे हैं।
प्रश्न यह भी है कि जब फिशकॉपफेड के बोर्ड में मछुआरों के विकास और उनके लाभ के लिए मत्स्य कार्य के अनुभवी एवं पारखी लोगों को सदस्य नामित किया जाता है तो फिर 5 साल से फिशकॉपफेड को घाटा क्यों हो रहा है। इसका मतलब स्पष्ट है कि बोर्ड में ग़ैरअनुभवी और नोसिखिये लोगों को रखा गया है। फिशकॉपफेड के कर्मचारी प्रबन्ध निदेशक बनकर मलाई चाटने के लिए जुगत लगाए रहते है। प्रबन्ध निदेशक ने हद तो तब और कर दी जब वह चेयरमैन के साथ विदेशी दौरे पर अकारण और बिना किसी को अपना पदभार दिए भ्रमण के लिए चले गए। इसके लिए मंत्रालय से किसी प्रकार की कोई अनुमति भी नही ली गई थी। इस विदेशी दौरे को लेकर सवाल यह भी है कि एमडी और चेयरमैन के द्वारा जो खर्च एवं व्यय हुआ है उसका भुगतान क्यों और किस मद से किया गया। जबकि दूसरी ओर कर्मचारियों को तनख्वाह के लाले पड़े हुए हैं।
फिशकॉपफेड में चर्चा यह भी है कि जब कृषि मंत्रालय के सीनियर अधिकारी की जांच रिपोर्ट के आधार पर विजिलेंस द्वारा एक्शन नही लिया गया तो फिर विजिलेंस का क्या अर्थ है और कृषि मंत्रालय को चाहिए कि वो ऐसे सफेद हाथी के वजूद को ही खत्म कर दे। फिशकॉपफेड बोर्ड को भंग कर वहां पर किसी प्रशासनिक अधिकारी को नियुक्त कर अपने अधीन कर ले।

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