अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने ही होंगे!


अनिल जैन

नई दिल्ली। एबीपी न्यूज से तीन पत्रकारों के रुखसत होने पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं देखने में आ रही हैं। सभी का मूल स्वर यही है कि तीनों सरकार और सत्तारुढ दल के कोप के शिकार बन गए। लेकिन मैं नहीं मानता कि यह कोई अनहोनी हुई है या इन तीनों पर कोई पहाड टूट पडा है। इससे पहले भी एबीपी और पूरी तरह सरकार विरोधी माने जाने वाले एनडीटीवी समेत कई चैनलों तथा अखबारों से कई पत्रकार और गैर पत्रकार कर्मचारी निकाले गए हैं। जब उनके बेरोजगार पर कोई आह-कराह नहीं तो, इन तीन पर ही क्यों स्यापा करना!
कहा जा रहा है कि तीनों को अपने सरकार विरोधी तेवर के चलते एबीपी से बाहर होना पडा। यह बात पुण्य प्रसून और कुछ हद तक अभिसार शर्मा के बारे में तो कही जा सकती है लेकिन मिलिंद खांडेकर को नाहक ही इन दोनों की श्रेणी में रखकर शहीद का दर्जा दिया जा रहा है। खांडेकर के बारे में सब जानते हैं कि वह संघनिष्ठ पत्रकार है और वह जहां भी रहा है, उसने उस निष्ठा के अनुरुप ही काम किया है। एबीपी न्यूज पर भी अगर पिछले कुछ सप्ताह से पुण्य प्रसून के शो का सत्ता विरोधी एक घंटा छोड दें तो बाकी तेईस घंटे तो बिल्कुल जी न्यूज और इंडिया टीवी की तर्ज पर सत्ता के भजन-कीर्तन ही तो होते हैं। दूसरे चैनलों की तरह वह भी नियमित रुप से हिंदू-मुसलमान करने में लगा रहता है।
जहां तक मास्टर स्ट्रोक की बात है, पुण्य प्रसून का यह शो शुरू करने का फैसला भी चैनल के संपादक की हैसियत से खांडेकर का अपना फैसला नहीं था बल्कि टीआरपी की दौड में दूसरे चैनलों की बराबरी करने या उनसे आगे निकलने की गरज से चैनल के प्रबंधन का फैसला था। लेकिन जब सरकार ने चैनल प्रबंधन पर आंखें तरेरी तो प्रबंधन ने अपनी दुकान को बंद होने से बचाने के लिए बिना किसी झिझक के पुण्य प्रसून की गर्दन नाप दी। खांडेकर को तो किन्हीं और वजहों से चलता किया गया है। सत्ता और बाजार की भक्ति में लीन रहने वाले मीडिया संस्थानों में ऐसा तो होता ही रहता है।
सत्ता विरोधी पत्रकारिता करने का खामियाजा भुगतने वाले पुण्य प्रसून और अभिसार कोई पहले या दूसरे पत्रकार नहीं हैं। विभिन्न मीडिया संस्थानों में यह सिलसिला पिछले चार सालों से लगातार चला आ रहा है। शुरुआती दौर में जो लोग इसके शिकार हुए थे, उनमें से मैं खुद भी एक हूँ। लेकिन मैंने न तो कभी अपने पीडित होने का प्रचार किया है और न ही कभी मुझे किसी की सहानुभूति की दरकार रही है। मैं प्रबंधन के खिलाफ अपनी लडाई कोर्ट में लड रहा हूँ। मैं ही नहीं, मेरे जैसे सैंकडों पत्रकार हैं, जो अपना जीवन कुछ मूल्यों के साथ डिजाइन करके जी रहे हैं। मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों पर अमल से बचने के लिए विभिन्न मीडिया संस्थानों में कत्ल-ए-आम मच चुका हैं, जिसकी वजह से हजारों पत्रकार-गैर पत्रकार बेरोजगार होकर संघर्ष कर रहे हैं। कुछ ने तो आत्महत्या तक कर ली है। गांव-कस्बों और छोटे शहरों में हजारों पत्रकार हैं जो हर तरह की जोखिम उठाकर अपने पेशागत दायित्वों का निर्वाह कर रहे हैं।
मुक्तिबोध तो बहुत पहले ही कह गए हैं कि अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने ही होंगे, तोडने होंगे मठ और गढ सब।

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