महिलाओं की भागीदारी से सब कतराते हैं फिर भी महिलाओं की बराबरी और उनके सम्मान की बात करते है

अध्यक्ष सोनिया गांधी और मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की कांग्रेस में दिल्ली प्रदेश इकाई ने एक भी महिला को जिला अध्यक्ष नहीं बनाया

हबीब अख्तर
शहर जो है दिल्ली। महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने के लिए देश के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने पंचायती राज व्यवस्था का कानून बनवाया जहां महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चि हुआ। और तो और एक दशक से अधिक जिस कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष सोनिया गांधी रहीं और दिल्ली में कांग्रेस की ही मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने 15 वर्षों तक एक छत्र राज किया आज उस पार्टी में महिलाओं को ससम्मान प्रतिनिधित्व दिए जाने का संकट दिखाई दे रहा है। अभी हाल में कांग्रेस के प्रमुख महासचिव अशोक गहलोत ने दिल्ली संगठन में 14 जिलों में से 12 जिला अध्यक्षों की जो सूची जारी की है उसमें एक भी महिला को शामिल नहीं किया गया। इस मामले को लेकर पार्टी के भीतर और बाहर सवाल उठने लगे हैं कि जिस कांग्रेस पंचायत व्यवस्था में महिलाओं के आरक्षण की व्यवस्था को कानूनी जामा पहनाया। और सभी जन प्रतिनिधि संस्थाओं में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण की हिमायत की है वह अपनी पार्टी की कतारों में महिलाओं को सम्मानजनक भागीदारी क्यों नहीं दे रही है। कहा जा सकता है कि प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष ने जो सूची अध्यक्ष बनाने के लिए पेश की उस पर अशोक गहलोत ने सहमति प्रकट की और राहुल गांधी ने ओके कर दिया? कांग्रेस ने जब सिद्धांत के तौर पर महिलाओं को संगठन में भी 33 प्रतिशत भागीदारी को सिद्धांत के तौर पर स्वीकार किया है तो यह चूक कैसे हो रही है। ऐसा लगता है निचले स्तर के नेता संगठन और सत्ता में महिलाओं की भागीदारी को मन से स्वीकार नहीं कर सकें हैं इसलिए इस ओर उनका ध्यान जाता नहीं है। इतना ही नहीं संगठन के कार्यालयों में भले ही वह कांग्रेस मुख्यालय हो या दिल्ली प्रदेश कांग्रेस का राजीव भवन महिलाओं की भागीदारी नगण्य है। कार्यालय के काम काज में विभिन्न वर्गों की भागीदारी और महिला कर्मचारी रखने में भी संकोच की स्थिति दिखाई देती है।
ज्यादातर राजनैतिक दल अपने दल का प्रवक्ता तो बना लेते हैं लेकिन पार्टी के निर्णायक व मुख्य बड़े पदों पर महिलाओं की भागीदारी से बचते नजर आते हैं। कहना न होगा कि आम आदमी पार्टी में भी लगभग ऐसी ही स्थिति है। निर्णायक पदों पर महिलाओं का अकाल दिखता है। दिल्ली सरकार के मंत्रियों में एक भी महिला को मंत्री पद नहीं दिया गया। यह पार्टी तो ये बहाना भी नहीं बना सकती कि जो महिलाएं विधायक बनी हैं उनमें अनुभव की कमी है, क्योंकि इस दल के लगभग सभी विधायक विधायकी और प्रशासनिक अनुभव में कोरे हैं। एक तरह से जिस तरह अरविन्द केजरीवाल पहलीबार विधायक बने ठीक उसी तरह से उनके दल के लगभग सभी लोग पहली बार विधान सभा पहुँचे हैं। सबने काम करना सीखा है तो महिलाएं भी सीख लेतीं ? दरअसल सत्ता कहीं की भी हो वहां की खुरचन भी स्वादिष्टï होती है। इसलिए किसी भी दल की महिलाएं मुखर होकर अपनी भागीदारी की मांग करने का साहस नहीं हो पाती हैं। इसलिए भी दलों में उनका बराबरी से सब जगह दिखाई देना संभव नहीं हो पा रहा है।
राजनैतिक दलों पर आरक्षण का कानूनी का शिकंजा नहीं इसलिए भी यह स्थिति है। देश के अन्य राज्यों में जिस तरह से बड़ी संख्या में महिलाएं पंचायत राजव्यवस्था के कारण सामाजिक कार्यों में बाहर निकल कर आईं हैं उसी तरह से दिल्ली के नगर निगमों में महिलाओं के वैधानिक आरक्षण के कारण बड़ी संख्या में महिलाओं का राजनीति में पदार्पण हुआ है। यह शुभ संकेत है। हर पार्टी में महिलाओं की यथोचित मौजूदगी न होने के कारण चुनाव के समय महिलाओं के लिए आरक्षित स्थानों पर पार्टियां सक्षम महिला उम्मीदवारों को खोजती नजर आती हैं। दल की पंक्तियों में महिलाएं न होने के कारण पुरुष कार्यकर्ताओं नेताओं के परिवार की महिलाओं को ही टिकट दे दिया जाता है। कई बार इस तरह के निर्णय के कारण शासन प्रशासन को उक्त मजिला नेत्री द्वारा चला पाना दुविधा पूर्ण भी दिखाई देता है। इसलिए जरूरी है कि वे अपनी पांतों में महिलाओं की उपयुक्त भागीदारी पहले से सुनिश्चित रखें।
सभी दलों को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि वह अपने दल में भी उसी तरह से महिलओं को वरियता दें जिस तरह से नगर निगम व पंचायतों में अनुसूचित जाति जना जाति व पिछड़ी जातियों को आरक्षण की व्यवस्था है। कहना न होगा कि देश में महिला अपमान, अत्याचार, उत्पीडऩ , बलात्कार की घटनओं का मुख्य कारण उनकी समाज में दोयम दर्जे की स्थिति की द्योतक हैं। जहां जहां महिलाओं को अपनी प्रतिभावओं को दिखाने का मुक्त व स्वतंत्र अवसर मिलता है वहां वे बौद्धिक रूप से किसी से कमतर नहीं रहती हैं। पूरे देश में शिक्षा का स्तर ही देख लीजिए । बोर्ड की हर परिक्षाओं में लड़किया हर वर्ष लडक़ों से आगे रहती हैं। इसी तरह से प्रतियोगी परीक्षाओं में भी वह अपना कीर्तिमान तक दर्ज करती हैं। समाज मानता है। व्यक्ति मानता है। शैक्षणिक संस्थान मानता है। और हर क्षेत्र के नतीजे साबित करते हैं कि महिलाएं किसी भी मामले में पुरुषों से पीछे नहीं हैं। घर और खानदानों में उनकी भूमिका को सब स्वीकार करते हैं। ऐसी स्थिति में राजनैतिक दलों को एक ऐसा टापू बनाना ठीक नहीं जहां चुनिंदा महिलाएं ही आ सकें। महिलाओं को हर स्तर पर सहज भागीदारी दिये जाने से उनका सहज नेतृत्व मिलेगा। जो अपने क्रिया कलापों से समाज और राजनीति उनमें जो हीनभावना बनाए रखने का अनजाने कार्य कर रही है उसको बदलना जरूरी है। हम अभी भी इस चिन्ता से उबर नहीं पाएं है कि महिलाएं राजनीति में आएंगी तो घर कौन देखेगा। एक दौर था जब लगभग सभी महिलाएं घर के कार्य देखा करती थीं। कुछ आगे बढ़े तो महिलाओं को शिक्षिका बनने तक छूट दी अब दौर बदल गया है। महिलाएं भी बदली हैं। उनके कार्यस्थल तक जाने और आने के लिए मैट्रो रेल में अलग बोगी, महिला स्पेशल बसें हैं कार्यस्थलों पर उनके लिए अलग से व्यवस्था है। वे लेखिका हैं, कवि हैं, इंजीनियर हैं, डाक्टर हैं, साइंटिस्ट हैं। एयर पायलट हैं। सवाल है कि वह कहां नहीं हैं। अगर वे देश की आधी आबादी हैं तो उन्हें देश और राज्य का नेतृत्व करने के लिए आधे हिस्से में भागीदारी देनी चाहिए। कांग्रेस पार्टी महिलाओं के अधिकारों के संरक्षण और उनको अधिकार दिए जाने के लिए अगर प्रतिबद्ध है तो उसे अपनी पांतों में बराबरी नहीं तो 33 प्रतिशत हिस्सा देने की व्यवस्था करे। समता मूलक समाज , बराबरी का समाज बनाने के लिए अन्य दलों को भी इस ओर कदम बढ़ाना चाहिए बल्कि बढ़े हुए कदमों की रफ्तार भी बढ़ानी चाहिए। भारतीय जनता पार्टी, आम आदमी पार्टी, समाजवादी पार्टी राााजे याजनतापार्टी सबकों अपने अपने दलों में महिलाओं की बराबरी की भागीदारी के लिए निरन्तर प्रयास जारी रखने चाहिएं। सभी दलों को अपने राज्य ,जिलों और ब्लाकों में महिलाओं की कम से कम 33 प्रतिशत भागीदारी सुनिश्चित करनी चाहिए। मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल को अपने संगठन के साथ कैबिनेट में महिला भागीारी घोषणा करनी चाहिए कांग्रेस अध्यक्ष अजय माकन को राजीव गांधी का स्मरण करते हुए संगठन में महिलाओं के असंतोष को दूर करना होगा। सभी दलों में अलग से सहयोगी महिला संगठन हैं केवल इससे काम नहीं चलेगा। सवाल मुख्य धारा में महिलाओं की भागीदारी का है

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